श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 111: मनुष्यके स्वभावकी पहचान बतानेवाली बाघ और सियारकी कथा  »  श्लोक 86
 
 
श्लोक  12.111.86 
कश्चिदेव हिते भर्तुर्दृश्यते न परात्मनो:।
कार्यापेक्षा हि वर्तन्ते भावस्निग्धा: सुदुर्लभा:॥ ८६॥
 
 
अनुवाद
ऐसा कोई एक ही पुरुष है जो अपने या दूसरों के हित की चिन्ता न करके केवल स्वामी के हित में ही लगा हुआ दिखाई देता है; क्योंकि स्वार्थ सिद्धि की इच्छा से प्रेम करने वाले तो बहुत हैं, परन्तु शुद्ध भाव से प्रेम करने वाले मनुष्य बहुत कम हैं॥ 86॥
 
‘There is only one such person who, instead of being concerned about his own or others' welfare, appears to be engaged in the welfare of the master only; because there are many who love with the intention of achieving their own selfish ends, but people who love with pure intentions are very rare.॥ 86॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)