श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 111: मनुष्यके स्वभावकी पहचान बतानेवाली बाघ और सियारकी कथा  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक  12.111.8 
तस्य शौचममृष्यन्तस्ते सर्वे सहजातय:।
चालयन्ति स्म तां बुद्धिं वचनै: प्रश्रयोत्तरै:॥ ८॥
 
 
अनुवाद
सियार का धार्मिक आचरण और विचार उसके सभी जाति-बंधुओं को पसन्द नहीं थे। यह सब उनके लिए असह्य हो गया; इसलिए वे प्रेमपूर्वक और नम्रतापूर्वक बोलकर उसकी बुद्धि को विचलित करने लगे।
 
The jackal's pious conduct and thoughts were not liked by all his fellow-caste members. All this became intolerable for them; therefore, they started disturbing his intellect by speaking lovingly and humbly. 8.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)