श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 111: मनुष्यके स्वभावकी पहचान बतानेवाली बाघ और सियारकी कथा  »  श्लोक 67
 
 
श्लोक  12.111.67 
तस्मात् प्रत्यक्षदृष्टोऽपि युक्तो ह्यर्थ: परीक्षितुम्।
परीक्ष्य ज्ञापयन्नर्थान्न पश्चात् परितप्यते॥ ६७॥
 
 
अनुवाद
अतः प्रत्यक्ष दिखाई देने वाली वस्तुओं की भी परीक्षा करना उचित है। जो मनुष्य किसी वस्तु के भले-बुरे को परखकर उसे करने की आज्ञा देता है, उसे बाद में पश्चाताप नहीं करना पड़ता। 67.
 
‘Therefore it is appropriate to test even the things which are directly visible. One who tests and examines the good and bad of something and then orders it to be done, does not have to repent later. 67.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)