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mahabharat 12.111.6: अब उसने जीव हिंसा त्याग दी, सत्य बोलने का व्रत लिया और अपने व्रत का कठोरता से पालन करने लगा। वह समय पर वृक्षों से अपने आप गिरे हुए फलों को खा लेता था।   |   mahabharat अध्याय 12.111: मनुष्यके स्वभावकी पहचान बतानेवाली बाघ और सियारकी कथा   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 111: मनुष्यके स्वभावकी पहचान बतानेवाली बाघ और सियारकी कथा  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  12.111.6 
अहिंस्र: सर्वभूतेषु सत्यवाक् सुदृढव्रत:।
स चकार यथाकालमाहारं पतितै: फलै:॥ ६॥
 
 
अनुवाद
अब उसने जीव हिंसा त्याग दी, सत्य बोलने का व्रत लिया और अपने व्रत का कठोरता से पालन करने लगा। वह समय पर वृक्षों से अपने आप गिरे हुए फलों को खा लेता था।
 
Now he gave up violence against living beings, took a vow to speak the truth and started following his vows strictly. He used to eat fruits that fell from the trees on their own at the prescribed time. 6.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)