श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 111: मनुष्यके स्वभावकी पहचान बतानेवाली बाघ और सियारकी कथा  »  श्लोक 54
 
 
श्लोक  12.111.54 
वाङ्मात्रेणैव धर्मिष्ठ: स्वभावेन तु दारुण:।
धर्मच्छद्मा ह्ययं पापो वृथाचारपरिग्रह:॥ ५४॥
 
 
अनुवाद
वह केवल बातों में ही धर्मात्मा होने का ढोंग करता है। स्वभाव से वह बड़ा क्रूर है। भीतर से तो वह महापापी है; परन्तु बाहर से धर्मात्मा होने का ढोंग करता है। उसके सारे आचरण और विचार केवल दिखावे के लिए हैं॥ 54॥
 
‘He pretends to be a righteous man only in words. He is very cruel by nature. He is a great sinner from within; but outwardly he pretends to be a righteous man. All his conduct and thoughts are just for vain show.॥ 54॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)