श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 111: मनुष्यके स्वभावकी पहचान बतानेवाली बाघ और सियारकी कथा  »  श्लोक 51-52
 
 
श्लोक  12.111.51-52 
छिद्रं तु तस्य तद् दृष्ट्वा प्रोचुस्ते पूर्वमन्त्रिण:॥ ५१॥
सर्वेषामेव सोऽस्माकं वृत्तिभङ्गे प्रवर्तते।
निश्चित्यैव पुनस्तस्य ते कर्माण्यपि वर्णयन्॥ ५२॥
 
 
अनुवाद
उसमें यह दोष देखकर प्रथम मन्त्री आपस में कहने लगे, "यह हम सबकी जीविका नष्ट करने पर तुला हुआ है; अतः हमें भी इससे बदला लेना चाहिए।" ऐसा निश्चय करके वे उसके अपराधों का वर्णन करने लगे।
 
Seeing this flaw in him, the first ministers started talking among themselves, "He is hell-bent on destroying the livelihood of all of us; therefore we should also take revenge from him." Having decided this, they started describing his crimes.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)