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mahabharat 12.111.4: धीरे-धीरे उसका जीवन समाप्त हो गया और उसने ऐसी गति प्राप्त की जो किसी भी जीव के लिए वांछित नहीं है। अपने पूर्व कर्मों से कलुषित होकर वह अगले जन्म में सियार हुआ॥4॥   |   mahabharat अध्याय 12.111: मनुष्यके स्वभावकी पहचान बतानेवाली बाघ और सियारकी कथा   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 111: मनुष्यके स्वभावकी पहचान बतानेवाली बाघ और सियारकी कथा  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  12.111.4 
स त्वायुषि परिक्षीणे जगामानीप्सितां गतिम्।
गोमायुत्वं च सम्प्रातो दूषित: पूर्वकर्मणा॥ ४॥
 
 
अनुवाद
धीरे-धीरे उसका जीवन समाप्त हो गया और उसने ऐसी गति प्राप्त की जो किसी भी जीव के लिए वांछित नहीं है। अपने पूर्व कर्मों से कलुषित होकर वह अगले जन्म में सियार हुआ॥4॥
 
Gradually his life came to an end and he attained a state which is not desired by any living being. Polluted by his previous karma, he became a jackal in his next birth.॥ 4॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)