श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 111: मनुष्यके स्वभावकी पहचान बतानेवाली बाघ और सियारकी कथा  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक  12.111.32 
पानीयं वा निरायासं स्वाद्वन्नं वा भयोत्तरम्।
विचार्य खलु पश्यामि तत्सुखं यत्र निर्वृति:॥ ३२॥
 
 
अनुवाद
एक स्थान पर तो बिना किसी भय के केवल जल मिलता है और दूसरे स्थान पर अंत में भय देने वाला स्वादिष्ट भोजन मिलता है - यदि मैं इन दोनों का विचार करूँ, तो जहाँ भय नहीं है, वहाँ ही मुझे सुख मिलता है ॥ 32॥
 
At one place one gets only water without any fear and at the other place one gets delicious food which gives fear in the end - if I consider both of these, then I find happiness only at the place where there is no fear. ॥ 32॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)