श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 111: मनुष्यके स्वभावकी पहचान बतानेवाली बाघ और सियारकी कथा  »  श्लोक 29
 
 
श्लोक  12.111.29 
किं तु स्वेनास्मि संतुष्टो दु:खवृत्तिरनुष्ठिता।
सेवायां चापि नाभिज्ञ: स्वच्छन्देन वनेचर:॥ २९॥
 
 
अनुवाद
मैं यहाँ अपने आप से संतुष्ट हूँ। मैंने एक ऐसा पेशा अपनाया है जो बहुत कष्टदायक है। मैं राज-सेवा के कर्तव्यों से अनभिज्ञ हूँ और जंगल में स्वतंत्र रूप से विचरण करता हूँ।
 
Here I am content with myself. I have adopted a profession which is very painful. I am ignorant of the duties of king's service and roam freely in the forest.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)