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mahabharat 12.110.30: हे निष्पाप युधिष्ठिर! इस प्रकार मैंने संक्षेप में वह कर्तव्य बताया है, जिसका पालन करने से मनुष्य इस लोक और परलोक में सभी दुःखों से मुक्त हो जाता है।   |   mahabharat अध्याय 12.110: सदाचार और ईश्वरभक्ति आदिको दु:खोंसे छूटनेका उपाय बताना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 110: सदाचार और ईश्वरभक्ति आदिको दु:खोंसे छूटनेका उपाय बताना  »  श्लोक 30
 
 
श्लोक  12.110.30 
इति कृत्यसमुद्देश: कीर्तितस्ते मयानघ।
तरन्ते येन दुर्गाणि परत्रेह च मानवा:॥ ३०॥
 
 
अनुवाद
हे निष्पाप युधिष्ठिर! इस प्रकार मैंने संक्षेप में वह कर्तव्य बताया है, जिसका पालन करने से मनुष्य इस लोक और परलोक में सभी दुःखों से मुक्त हो जाता है।
 
O sinless Yudhishthira! Thus have I briefly explained the duty, by following which a man can be freed from all sufferings in this world and the next.
 
इ ति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि दुर्गातितरणं नाम दशाधिकशततमोऽध्याय:॥ ११०॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें दुर्गातितरण नामक एक सौ दसवाँ अध्याय पूरा हआ॥ ११०॥

(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ३ १/२ श्लोक मिलाकर कुल ३३ १/२ श्लोक हैं)
 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)