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mahabharat 12.110.26: उनका रूप अकल्पनीय है। इन परम मंगलमय भगवान गोविन्द ने स्वेच्छापूर्वक इन समस्त लोकों को चमड़े के समान ढ़क रखा है। 26॥   |   mahabharat अध्याय 12.110: सदाचार और ईश्वरभक्ति आदिको दु:खोंसे छूटनेका उपाय बताना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 110: सदाचार और ईश्वरभक्ति आदिको दु:खोंसे छूटनेका उपाय बताना  »  श्लोक 26
 
 
श्लोक  12.110.26 
य इमान् सकलाँल्लोकांश्चर्मवत् परिवेष्टयेत्।
इच्छन् प्रभुरचिन्त्यात्मा गोविन्द: पुरुषोत्तम:॥ २६॥
 
 
अनुवाद
उनका रूप अकल्पनीय है। इन परम मंगलमय भगवान गोविन्द ने स्वेच्छापूर्वक इन समस्त लोकों को चमड़े के समान ढ़क रखा है। 26॥
 
Their form is unimaginable. This most auspicious Lord Govind has willingly covered all these worlds like leather. 26॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)