श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 11: अर्जुनका पक्षिरूपधारी इन्द्र और ऋषिबालकोंके संवादका उल्लेखपूर्वक गृहस्थ-धर्मके पालनपर जोर देना  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  12.11.6 
ऋषय ऊचु:
अहो बतायं शकुनिर्विघसाशान् प्रशंसति।
अस्मान् नूनमयं शास्ति वयं च विघसाशिन:॥ ६॥
 
 
अनुवाद
ऋषि बोले - "अरे! यह पक्षी अन्न (यज्ञ से बचा हुआ भोजन) का नाश करने वाले लोगों की स्तुति कर रहा है। यह अवश्य ही हमारी स्तुति कर रहा है, क्योंकि यहाँ तो हम अन्न के नाश करने वाले हैं।"
 
The sage said - Oh! This bird praises the people who are the destroyers of food (food left over from sacrifices). It is definitely praising us because here we are the destroyers of food.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)