श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 11: अर्जुनका पक्षिरूपधारी इन्द्र और ऋषिबालकोंके संवादका उल्लेखपूर्वक गृहस्थ-धर्मके पालनपर जोर देना  »  श्लोक 4-5
 
 
श्लोक  12.11.4-5 
तानाबभाषे भगवान् पक्षी भूत्वा हिरण्मय:।
सुदुष्करं मनुष्यैश्च यत् कृतं विघसाशिभि:॥ ४॥
पुण्यं भवति कर्मेदं प्रशस्तं चैव जीवितम्।
सिद्धार्थास्ते गतिं मुख्यां प्राप्ता धर्मपरायणा:॥ ५॥
 
 
अनुवाद
भगवान इन्द्र वहाँ स्वर्ण पक्षी का रूप धारण करके आये और उनसे इस प्रकार कहने लगे - 'यज्ञ से बचे हुए अन्न को खाने वाले महापुरुषों का कार्य दूसरों के लिए बड़ा कठिन है। उनका कार्य बड़ा पवित्र है और उनका जीवन बड़ा उत्तम है। उन धार्मिक पुरुषों ने अपनी कामनाओं की पूर्ति करके उत्तम गति प्राप्त की है।'॥4-5॥
 
Lord Indra came there in the form of a golden bird and started talking to them in this way - 'The work done by the great men who eat the food left over from the sacrifices is very difficult for others to do. Their work is very pure and their life is very good. Those religious men have achieved the best by fulfilling their wishes.'॥ 4-5॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)