श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 11: अर्जुनका पक्षिरूपधारी इन्द्र और ऋषिबालकोंके संवादका उल्लेखपूर्वक गृहस्थ-धर्मके पालनपर जोर देना  »  श्लोक 22
 
 
श्लोक  12.11.22 
एतद् विदुस्तपो विप्रा द्वन्द्वातीता विमत्सरा:।
तस्माद् व्रतं मध्यमं तु लोकेषु तप उच्यते॥ २२॥
 
 
अनुवाद
जो ब्राह्मण किसी के प्रति ईर्ष्या नहीं रखते, जो सब प्रकार के द्वन्द्वों से रहित हैं, वे इसे ही तप मानते हैं। यद्यपि लोक में उपवास को भी तप कहा गया है, किन्तु वह पंचयज्ञ के अनुष्ठान की अपेक्षा मध्यम श्रेणी का है। 22॥
 
Those Brahmins who do not have jealousy towards anyone, who are free from all kinds of conflicts, consider this as penance. Although fasting is also called penance in the world, but it is of moderate category compared to the ritual of Panchayagya. 22॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)