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mahabharat 12.107.11: पहले एक मनुष्य लोभ को चुनता है (दूसरे का धन हड़पने की इच्छा करता है), फिर दूसरे के मन में द्वेष उत्पन्न होता है; तब लोभ और द्वेष से प्रभावित दोनों व्यक्ति एक-दूसरे के नाशक बन जाते हैं, तथा समुदाय, धन और जन की बड़ी हानि उठाते हैं॥ 11॥   |   mahabharat अध्याय 12.107: गणतन्त्र राज्यका वर्णन और उसकी नीति   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 107: गणतन्त्र राज्यका वर्णन और उसकी नीति  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक  12.107.11 
लोभमेको हि वृणुते ततोऽमर्षमनन्तरम्।
तौ क्षयव्ययसंयुक्तावन्योन्यं च विनाशिनौ॥ ११॥
 
 
अनुवाद
पहले एक मनुष्य लोभ को चुनता है (दूसरे का धन हड़पने की इच्छा करता है), फिर दूसरे के मन में द्वेष उत्पन्न होता है; तब लोभ और द्वेष से प्रभावित दोनों व्यक्ति एक-दूसरे के नाशक बन जाते हैं, तथा समुदाय, धन और जन की बड़ी हानि उठाते हैं॥ 11॥
 
First a person chooses greed (desires to take the wealth of another person), then resentment arises in the mind of the other person; then both the persons affected by greed and resentment become each other's destroyers, suffering a great loss of community, wealth and people.॥ 11॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)