Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 12.105.14: यदि ऐसा करते समय शत्रु को उस व्यसन में लिप्त होने से रोकने या मना करने की आवश्यकता हो, तो वैसा ही करना चाहिए; अथवा यदि वह उपेक्षा करने योग्य हो, तो उसकी उपेक्षा कर देनी चाहिए; परंतु जो राजा उत्तम नीति का फल चाहता है, उसे किसी भी स्थिति में अपने गुप्त मन्त्र शत्रु पर प्रकट नहीं करने चाहिए ॥14॥ | mahabharat अध्याय 12.105: कालकवृक्षीय मुनिके द्वारा गये हुए राज्यकी प्राप्तिके लिये विभिन्न उपायोंका वर्णन । mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
यद्येवं प्रतिषेद्धव्यो यद्युपेक्षणमर्हति।
न जातु विवृत: कार्य: शत्रु: सुनयमिच्छता॥ १४॥
अनुवाद
यदि ऐसा करते समय शत्रु को उस व्यसन में लिप्त होने से रोकने या मना करने की आवश्यकता हो, तो वैसा ही करना चाहिए; अथवा यदि वह उपेक्षा करने योग्य हो, तो उसकी उपेक्षा कर देनी चाहिए; परंतु जो राजा उत्तम नीति का फल चाहता है, उसे किसी भी स्थिति में अपने गुप्त मन्त्र शत्रु पर प्रकट नहीं करने चाहिए ॥14॥
If, while doing so, there is a need to stop or forbid the enemy from indulging in that addiction, that should be done; or if it is worthy of being ignored, then it should be ignored; but a king who wants the result of a good policy should not, under any circumstances, reveal his secret intentions to the enemy. ॥14॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥