श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 104: राज्य, खजाना और सेना आदिसे वंचित हुए असहाय क्षेमदर्शी राजाके प्रति कालकवृक्षीय मुनिका वैराग्यपूर्ण उपदेश  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  12.104.7 
निर्विद्यति नर: कामान्निर्विद्य सुखमेधते।
त्यक्त्वा प्रीतिं च शोकं च लब्ध्वा बुद्धिमयं वसु॥ ७॥
 
 
अनुवाद
जब भी मनुष्य सांसारिक सुखों से विरक्त हो जाता है, तब वह सुख-दुःख का त्याग कर देता है और ज्ञानरूपी धन को प्राप्त होकर शाश्वत सुख का अनुभव करने लगता है ॥7॥
 
Whenever a man becomes detached from worldly pleasures, he gives up joy and sorrow and, having attained the wealth of knowledge, begins to experience eternal happiness. ॥ 7॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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