श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 104: राज्य, खजाना और सेना आदिसे वंचित हुए असहाय क्षेमदर्शी राजाके प्रति कालकवृक्षीय मुनिका वैराग्यपूर्ण उपदेश  »  श्लोक 54
 
 
श्लोक  12.104.54 
असम्भवे श्रियो राजन् हीनस्य सचिवादिभि:।
दैवे प्रतिनिविष्टे च किं श्रेयो मन्यते भवान्॥ ५४॥
 
 
अनुवाद
हे राजन! अब आपके लिए धन की कोई संभावना नहीं है। आपके मंत्री नष्ट हो चुके हैं और भाग्य भी आपके विरुद्ध है। ऐसी स्थिति में आप अपने लिए कौन-सा मार्ग श्रेष्ठ समझते हैं?॥ 54॥
 
O King! There is no possibility of wealth for you now. You have lost your ministers and the fate is also against you. In such a situation, which path do you think is best for you?॥ 54॥
 
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि कालकवृक्षीये चतुरधिकशततमोऽध्याय:॥ १०४॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें कालकवृक्षीय मुनिका उपदेशविषयक एक सौ चारवाँ अध्याय पूरा हआ॥ १०४॥

(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ४ १/२ श्लोक मिलाकर कुल ५८ १/२ श्लोक हैं)
 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)