श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 104: राज्य, खजाना और सेना आदिसे वंचित हुए असहाय क्षेमदर्शी राजाके प्रति कालकवृक्षीय मुनिका वैराग्यपूर्ण उपदेश  »  श्लोक 51
 
 
श्लोक  12.104.51 
अपि मूलफलाजीवो रमस्वैको महावने।
वाग्यत: संगृहीतात्मा सर्वभूतदयान्वित:॥ ५१॥
 
 
अनुवाद
तुम्हें विशाल वन में अकेले ही घूमना चाहिए, कंद-मूल और फल खाकर रहना चाहिए। अपनी वाणी, मन और इन्द्रियों को वश में रखना चाहिए तथा सभी प्राणियों पर दया करनी चाहिए। ॥ 51॥
 
You should roam alone in the vast forest, living on roots and fruits. Control your speech, mind and senses and maintain compassion towards all creatures. ॥ 51॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)