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श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 104: राज्य, खजाना और सेना आदिसे वंचित हुए असहाय क्षेमदर्शी राजाके प्रति कालकवृक्षीय मुनिका वैराग्यपूर्ण उपदेश  »  श्लोक 48
 
 
श्लोक  12.104.48 
प्राप्तिसृष्टेषु भावेषु व्यपकृष्टेष्वसम्भवे।
प्रज्ञानतृप्तो विक्रान्तस्त्वद्विधो नानुशोचति॥ ४८॥
 
 
अनुवाद
सभी वस्तुएँ केवल सम्पर्क में आने पर ही दिखाई देती हैं। दूर जाने पर उन्हें देख पाना सम्भव नहीं है। ऐसी स्थिति में, आप जैसा व्यक्ति, जो विद्या और बुद्धि से संतुष्ट है तथा वीरता से संपन्न है, शोक नहीं करता।
 
All objects are visible only when they come in contact. It is not possible to see them when they go far away. In such a situation, a person like you, who is satisfied with knowledge and wisdom and is endowed with valour, does not grieve.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)