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mahabharat 12.104.36: फिर भी, तुम बुद्धिमान हो। तुम जानते हो कि सुख प्रारब्ध के अधीन हैं और अस्थिर हैं। फिर भी, तुम उन वस्तुओं की इच्छा करते हो जो वांछित नहीं हैं और उनके लिए दीनतापूर्वक शोक करते हो ॥ 36॥   |   mahabharat अध्याय 12.104: राज्य, खजाना और सेना आदिसे वंचित हुए असहाय क्षेमदर्शी राजाके प्रति कालकवृक्षीय मुनिका वैराग्यपूर्ण उपदेश   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  12.104.36 
त्वं पुन: प्राज्ञरूप: सन् कृपणं परितप्यसे।
अकाम्यान् कामयानोऽर्थान् पराधीनानुपद्रवान्॥ ३६॥
 
 
अनुवाद
फिर भी, तुम बुद्धिमान हो। तुम जानते हो कि सुख प्रारब्ध के अधीन हैं और अस्थिर हैं। फिर भी, तुम उन वस्तुओं की इच्छा करते हो जो वांछित नहीं हैं और उनके लिए दीनतापूर्वक शोक करते हो ॥ 36॥
 
However, you are intelligent. You know that pleasures are subject to destiny and are unstable. Still, you desire things that are not to be desired and you grieve for them, showing humility. ॥ 36॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)