श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 104: राज्य, खजाना और सेना आदिसे वंचित हुए असहाय क्षेमदर्शी राजाके प्रति कालकवृक्षीय मुनिका वैराग्यपूर्ण उपदेश  »  श्लोक 34
 
 
श्लोक  12.104.34 
श्रियं च पुत्रपौत्रं च मनुष्या धर्मचारिण:।
योगधर्मविदो धीरा: स्वयमेव त्यजन्त्युत॥ ३४॥
 
 
अनुवाद
जो पुण्यात्मा और धैर्यवान पुरुष योग के तत्त्व को जानते हैं, वे अपनी सम्पत्ति तथा अपने पुत्र-पौत्रों को भी स्वयं ही त्याग देते हैं।
 
The virtuous and patient men who know the principles of Yoga, give up their property and even their children and grandchildren on their own.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)