Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 12.104.28: मनुष्य केवल उन्हीं वस्तुओं की इच्छा करता है जो प्राप्त करने योग्य हैं। वह उन वस्तुओं की कभी इच्छा नहीं करता जो प्राप्त नहीं की जा सकतीं। इसलिए जो कुछ तुम्हारे पास है, उसका तुम भी भोग करो और उन वस्तुओं की कभी चिंता मत करो जो प्राप्त नहीं की जा सकतीं॥ 28॥ | mahabharat अध्याय 12.104: राज्य, खजाना और सेना आदिसे वंचित हुए असहाय क्षेमदर्शी राजाके प्रति कालकवृक्षीय मुनिका वैराग्यपूर्ण उपदेश । mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
अवाप्यान् कामयन्नर्थान् नानवाप्यान् कदाचन।
प्रत्युत्पन्नाननुभवन् मा शुचस्त्वमनागतान्॥ २८॥
अनुवाद
मनुष्य केवल उन्हीं वस्तुओं की इच्छा करता है जो प्राप्त करने योग्य हैं। वह उन वस्तुओं की कभी इच्छा नहीं करता जो प्राप्त नहीं की जा सकतीं। इसलिए जो कुछ तुम्हारे पास है, उसका तुम भी भोग करो और उन वस्तुओं की कभी चिंता मत करो जो प्राप्त नहीं की जा सकतीं॥ 28॥
Man desires only those things which are attainable. He never desires those things which are unattainable. Therefore you should also enjoy whatever you have and never worry about those things which are unattainable.॥ 28॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥