श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 104: राज्य, खजाना और सेना आदिसे वंचित हुए असहाय क्षेमदर्शी राजाके प्रति कालकवृक्षीय मुनिका वैराग्यपूर्ण उपदेश  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  12.104.18 
आत्मनोऽध्रुवतां पश्यंस्तांस्त्वं किमनुशोचसि।
बुद्धॺा चैवानुबुद्धॺस्व ध्रुवं हि न भविष्यसि॥ १८॥
 
 
अनुवाद
तुम देखते और समझते हो कि यह शरीर अनित्य है, फिर तुम अपने पूर्वजों के लिए क्यों निरन्तर शोक करते हो? अपनी बुद्धि से विचार करो, एक दिन तुम्हारा भी अस्तित्व नहीं रहेगा ॥18॥
 
You see and understand that this body is temporary, then why do you constantly grieve for your ancestors? Just think with your intelligence, one day you too will not exist. ॥ 18॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas