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mahabharat 12.104.13: जो कुछ तुम 'यह है' मानते हो, उसे पहले ही जान लेना चाहिए कि वह 'नहीं है'। ऐसा मानने वाला विद्वान पुरुष कठिन से कठिन विपत्ति में भी व्याकुल नहीं होता। ॥13॥   |   mahabharat अध्याय 12.104: राज्य, खजाना और सेना आदिसे वंचित हुए असहाय क्षेमदर्शी राजाके प्रति कालकवृक्षीय मुनिका वैराग्यपूर्ण उपदेश   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 104: राज्य, खजाना और सेना आदिसे वंचित हुए असहाय क्षेमदर्शी राजाके प्रति कालकवृक्षीय मुनिका वैराग्यपूर्ण उपदेश  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक  12.104.13 
यत् किंचिन्मन्यसेऽस्तीति सर्वं नास्तीति विद्धि तत्।
एवं न व्यथते प्राज्ञ: कृच्छ्रामप्यापदं गत:॥ १३॥
 
 
अनुवाद
जो कुछ तुम 'यह है' मानते हो, उसे पहले ही जान लेना चाहिए कि वह 'नहीं है'। ऐसा मानने वाला विद्वान पुरुष कठिन से कठिन विपत्ति में भी व्याकुल नहीं होता। ॥13॥
 
Whatever you believe as 'this is', you should know beforehand that it 'is not'. A learned man who believes this does not get distressed even when he faces the most difficult calamity. ॥13॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)