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mahabharat 12.104.10: हे ब्रह्मन! मैं राज्य के धन से वंचित हो गया हूँ, दरिद्र और दुःखी हूँ और इस दयनीय स्थिति को प्राप्त हुआ हूँ। कृपया मुझे इस संसार में धन के अतिरिक्त जो सुख है, उसका उपदेश दीजिए॥10॥   |   mahabharat अध्याय 12.104: राज्य, खजाना और सेना आदिसे वंचित हुए असहाय क्षेमदर्शी राजाके प्रति कालकवृक्षीय मुनिका वैराग्यपूर्ण उपदेश   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  12.104.10 
इमामवस्थां सम्प्राप्तं दीनमार्तं श्रिया च्युतम्।
यदन्यत् सुखमस्तीह तद् ब्रह्मन्ननुशाधि माम्॥ १०॥
 
 
अनुवाद
हे ब्रह्मन! मैं राज्य के धन से वंचित हो गया हूँ, दरिद्र और दुःखी हूँ और इस दयनीय स्थिति को प्राप्त हुआ हूँ। कृपया मुझे इस संसार में धन के अतिरिक्त जो सुख है, उसका उपदेश दीजिए॥10॥
 
O Brahman! I have been deprived of the wealth of the kingdom, am poor and distressed and have reached this pitiable state. Please teach me the happiness that exists in this world other than wealth.॥10॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)