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mahabharat 12.103.49: जो कहीं से आकर अलग खाता है और दूसरे के साथ नहीं बैठता और कहता है कि आज का भोजन आवश्यकता के अनुसार नहीं बना (वह भी दुष्ट है) इस प्रकार दुष्ट व्यक्ति की दुष्टता उसके बैठने, सोने और चलने-फिरने में विशेष रूप से दिखाई देती है॥ 49॥   |   mahabharat अध्याय 12.103: शत्रुको वशमें करनेके लिये राजाको किस नीतिसे काम लेना चाहिये और दुष्टोंको कैसे पहचानना चाहिये—इसके विषयमें इन्द्र और बृहस्पतिका संवाद   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 103: शत्रुको वशमें करनेके लिये राजाको किस नीतिसे काम लेना चाहिये और दुष्टोंको कैसे पहचानना चाहिये—इसके विषयमें इन्द्र और बृहस्पतिका संवाद  »  श्लोक 49
 
 
श्लोक  12.103.49 
पृथगेत्य समश्नाति नेदमद्य यथाविधि।
आसने शयने याने भावा लक्ष्या विशेषत:॥ ४९॥
 
 
अनुवाद
जो कहीं से आकर अलग खाता है और दूसरे के साथ नहीं बैठता और कहता है कि आज का भोजन आवश्यकता के अनुसार नहीं बना (वह भी दुष्ट है) इस प्रकार दुष्ट व्यक्ति की दुष्टता उसके बैठने, सोने और चलने-फिरने में विशेष रूप से दिखाई देती है॥ 49॥
 
One who comes from somewhere and eats separately and does not sit with the other person and says that the food prepared today is not as per the requirement (he is also wicked). In this way, the wickedness of a wicked person is especially seen in his sitting, sleeping and walking around.॥ 49॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)