श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 103: शत्रुको वशमें करनेके लिये राजाको किस नीतिसे काम लेना चाहिये और दुष्टोंको कैसे पहचानना चाहिये—इसके विषयमें इन्द्र और बृहस्पतिका संवाद  »  श्लोक 47
 
 
श्लोक  12.103.47 
तूष्णीम्भावेऽपि विज्ञेयं न चेद् भवति कारणम्।
नि:श्वासं चोष्ठसंदंशं शिरसश्च प्रकम्पनम्॥ ४७॥
 
 
अनुवाद
यदि कोई मनुष्य चुपचाप बैठा भी रहे, तो भी उसकी दुष्टता इसी प्रकार जानी जा सकती है। जो किसी के गुणों का वर्णन होने पर गहरी साँस छोड़ता है, ओठों को काटता है और बिना कारण के भी सिर हिलाता है, वह दुष्ट है ॥47॥
 
Even if a person sits quietly, his wickedness can be known in this way. One who, when someone's qualities are described, exhales deeply, bites his lips and shakes his head even when there is no reason to do so, is wicked. ॥ 47॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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