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mahabharat 12.103.46: बृहस्पतिजी बोले - देवराज! जो व्यक्ति परोक्ष रूप से किसी व्यक्ति के दोषों का बखान करता है, उसके सद्गुणों में भी दोष ढूंढ़ता रहता है और यदि दूसरे लोग उसके गुणों का वर्णन करें तो वह मुँह फेरकर चुपचाप बैठ जाता है, वह दुष्ट माना गया है ॥ 46॥   |   mahabharat अध्याय 12.103: शत्रुको वशमें करनेके लिये राजाको किस नीतिसे काम लेना चाहिये और दुष्टोंको कैसे पहचानना चाहिये—इसके विषयमें इन्द्र और बृहस्पतिका संवाद   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  12.103.46 
बृहस्पतिरुवाच
परोक्षमगुणानाह सद्‍गुणानभ्यसूयते।
परैर्वा कीर्त्यमानेषु तूष्णीमास्ते पराङ्मुख:॥ ४६॥
 
 
अनुवाद
बृहस्पतिजी बोले - देवराज! जो व्यक्ति परोक्ष रूप से किसी व्यक्ति के दोषों का बखान करता है, उसके सद्गुणों में भी दोष ढूंढ़ता रहता है और यदि दूसरे लोग उसके गुणों का वर्णन करें तो वह मुँह फेरकर चुपचाप बैठ जाता है, वह दुष्ट माना गया है ॥ 46॥
 
Brihaspati said - Devraj! He who indirectly points out the faults of a person, also keeps on finding faults in his good qualities and if other people describe his qualities then he turns his face away and sits quietly, is considered to be a wicked person. ॥ 46॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)