श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 103: शत्रुको वशमें करनेके लिये राजाको किस नीतिसे काम लेना चाहिये और दुष्टोंको कैसे पहचानना चाहिये—इसके विषयमें इन्द्र और बृहस्पतिका संवाद  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक  12.103.32 
न ह्यतो दुष्करं कर्म किंचिदस्ति सुरोत्तम।
यथा विविधवृत्तानामैश्वर्यममराधिप॥ ३२॥
 
 
अनुवाद
हे देवराज! देवश्रेष्ठ! नाना प्रकार से चतुर मनुष्यों के धन का शासन करने से बढ़कर कोई कठिन कार्य नहीं है ॥ 32॥
 
O lord of gods! Best of the gods! There is no task more arduous than governing the wealth of people who are shrewd in various ways. ॥ 32॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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