|
| |
| |
श्लोक 12.103.32  |
न ह्यतो दुष्करं कर्म किंचिदस्ति सुरोत्तम।
यथा विविधवृत्तानामैश्वर्यममराधिप॥ ३२॥ |
| |
| |
| अनुवाद |
| हे देवराज! देवश्रेष्ठ! नाना प्रकार से चतुर मनुष्यों के धन का शासन करने से बढ़कर कोई कठिन कार्य नहीं है ॥ 32॥ |
| |
| O lord of gods! Best of the gods! There is no task more arduous than governing the wealth of people who are shrewd in various ways. ॥ 32॥ |
| ✨ ai-generated |
| |
|