श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 103: शत्रुको वशमें करनेके लिये राजाको किस नीतिसे काम लेना चाहिये और दुष्टोंको कैसे पहचानना चाहिये—इसके विषयमें इन्द्र और बृहस्पतिका संवाद  »  श्लोक 27
 
 
श्लोक  12.103.27 
अशक्यमिति कृत्वा वा ततोऽन्यै: संविदं चरेत्।
ब्रह्मदण्डमदृष्टेषु दृष्टेषु चतुरङ्गिणीम्॥ २७॥
 
 
अनुवाद
जो कार्य अकेले करना असम्भव हो, उसके लिए दूसरों के साथ बैठकर विचार-विमर्श करो। यदि शत्रु दूर होने के कारण दिखाई न दे, तो उस पर ब्रह्मदण्ड का प्रयोग करो और यदि शत्रु निकट होने के कारण दिखाई दे, तो चतुरंगिणी सेना भेजकर उस पर आक्रमण करो॥ 27॥
 
For the work which is impossible to do alone, sit and discuss with others. If the enemy is not visible due to being far away, then use Brahmadanda on him and if the enemy is visible due to being nearby, then attack him by sending a four-fold army.॥ 27॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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