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mahabharat 12.103.25: मृदुता, दण्ड, आलस्य और प्रमाद - इन चारों का नाश करके उसे शत्रु की माया का भी प्रतीक बनाना चाहिए। तत्पश्चात् वह बिना विचारे शत्रुओं पर आक्रमण कर सकता है। 25॥   |   mahabharat अध्याय 12.103: शत्रुको वशमें करनेके लिये राजाको किस नीतिसे काम लेना चाहिये और दुष्टोंको कैसे पहचानना चाहिये—इसके विषयमें इन्द्र और बृहस्पतिका संवाद   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 103: शत्रुको वशमें करनेके लिये राजाको किस नीतिसे काम लेना चाहिये और दुष्टोंको कैसे पहचानना चाहिये—इसके विषयमें इन्द्र और बृहस्पतिका संवाद  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  12.103.25 
निहत्यैतानि चत्वारि मायां प्रति विधाय च।
तत: शक्नोति शत्रूणां प्रहर्तुमविचारयन्॥ २५॥
 
 
अनुवाद
मृदुता, दण्ड, आलस्य और प्रमाद - इन चारों का नाश करके उसे शत्रु की माया का भी प्रतीक बनाना चाहिए। तत्पश्चात् वह बिना विचारे शत्रुओं पर आक्रमण कर सकता है। 25॥
 
By destroying these four – softness, punishment, laziness and carelessness – he should also symbolize the illusion of the enemy. After that he can attack the enemies without thinking. 25॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)