श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 103: शत्रुको वशमें करनेके लिये राजाको किस नीतिसे काम लेना चाहिये और दुष्टोंको कैसे पहचानना चाहिये—इसके विषयमें इन्द्र और बृहस्पतिका संवाद  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक  12.103.13 
न संनिपात: कर्तव्य: सामान्ये विजये सति।
विश्वास्यैवोपसन्नार्थो वशे कृत्वा रिपु: प्रभो॥ १३॥
 
 
अनुवाद
हे प्रभु! चूँकि युद्ध में विजय सामान्य बात है (किसी को भी मिल सकती है), इसलिए पहले तो उसके लिए युद्ध नहीं करना चाहिए, बल्कि शत्रु को पूरी तरह से समझाकर और उसे वश में करके, अवसर पाकर उसकी सारी योजनाओं को नष्ट कर देना चाहिए॥13॥
 
O Lord! Since victory in war is a common thing (anyone can get it), then one should not fight for it in the first place, but after convincing the enemy completely and subduing him, one should destroy all his plans when one finds an opportunity.॥ 13॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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