श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 103: शत्रुको वशमें करनेके लिये राजाको किस नीतिसे काम लेना चाहिये और दुष्टोंको कैसे पहचानना चाहिये—इसके विषयमें इन्द्र और बृहस्पतिका संवाद  »  श्लोक 10-11
 
 
श्लोक  12.103.10-11 
विरमेच्छुष्कवैरेभ्य: कण्ठायासांश्च वर्जयेत्।
यथा वैतंसिको युक्तो द्विजानां सदृशस्वन:॥ १०॥
तान् द्विजान् कुरुते वश्यांस्तथा युक्तो महीपति:।
वशं चोपनयेच्छत्रून् निहन्याच्च पुरंदर॥ ११॥
 
 
अनुवाद
पुरन्दर! शुष्क वैर से दूर रहो, गले को कष्ट देने वाले तर्कों का त्याग करो। जैसे शिकारी अपने काम में सावधानी से लगा रहता है और पक्षियों को फँसाने के लिए उनकी तरह बोलता है और अवसर पाकर उन्हें वश में कर लेता है, उसी प्रकार परिश्रमी राजा को चाहिए कि वह अपने शत्रुओं को धीरे-धीरे वश में करके फिर उनका वध कर दे॥10-11॥
 
Purandar! Stay away from dry enmity, give up arguments that hurt the throat. Just as a hunter is carefully engaged in his work and speaks like the birds to trap them and when he gets a chance, he subdues them, in the same way an industrious king should gradually subdue his enemies and then kill them.॥10-11॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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