श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 10: भीमसेनका राजाके लिये संन्यासका विरोध करते हुए अपने कर्तव्यके ही पालनपर जोर देना  »  श्लोक 28
 
 
श्लोक  12.10.28 
अवेक्षस्व यथा स्वै: स्वै: कर्मभिर्व्यापृतं जगत‍्।
तस्मात् कर्मैव कर्तव्यं नास्ति सिद्धिरकर्मण:॥ २८॥
 
 
अनुवाद
देखो और विचार करो कि सारा जगत किस प्रकार अपने-अपने कर्तव्यों में लगा हुआ है; अतः तुम्हें भी क्षत्रिय के कर्तव्यों का पालन करना चाहिए। जो अपने कर्तव्यों का परित्याग करता है, वह कभी सिद्धि प्राप्त नहीं करता॥ 28॥
 
Look and think how the whole world is engaged in its duties; hence you too should perform the duties of a Kshatriya. He who abandons his duties never attains success.॥ 28॥
 
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि भीमवाक्ये दशमोऽध्याय:॥ १०॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें भीमसेनका वचनविषयक दसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १०॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)