श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 10: भीमसेनका राजाके लिये संन्यासका विरोध करते हुए अपने कर्तव्यके ही पालनपर जोर देना  »  श्लोक 27
 
 
श्लोक  12.10.27 
औदका: सृष्टयश्चैव जन्तव: सिद्धिमाप्नुयु:।
तेषामात्मैैव भर्तव्यो नान्य: कश्चन विद्यते॥ २७॥
 
 
अनुवाद
(यदि अपने शरीर का ही भरण-पोषण करने से सिद्धि प्राप्त हो सकती है, तो) जलचर और स्थावर प्राणियों को भी सिद्धि प्राप्त करनी चाहिए; क्योंकि उन्हें अपना ही भरण-पोषण करना है। उनके पास दूसरा कोई नहीं है जिसका भरण-पोषण वे कर सकें॥27॥
 
(If one can attain siddhi by just providing for one's own body, then) even aquatic creatures and immobile creatures should also attain siddhi; because they have to provide for themselves only. They do not have anyone else whose maintenance they can bear.॥ 27॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)