श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 10: भीमसेनका राजाके लिये संन्यासका विरोध करते हुए अपने कर्तव्यके ही पालनपर जोर देना  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  12.10.2 
आलस्ये कृतचित्तस्य राजधर्मानसूयत:।
विनाशे धार्तराष्ट्राणां किं फलं भरतर्षभ॥ २॥
 
 
अनुवाद
भरतश्रेष्ठ! यदि आपने राजधर्म की निन्दा करके आलसी जीवन जीने का निश्चय किया था, तो धृतराष्ट्र के पुत्रों का नाश करने का क्या फल हुआ?
 
Bharatshrestha! If you had decided to live a lazy life by criticizing Rajdharma, then what was the result of destroying Dhritarashtra's sons? 2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)