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mahabharat 12.10.13: जैसे भूखा मनुष्य भोजन का आनंद नहीं लेता और कामी पुरुष प्रारब्धवश स्त्री का आनंद नहीं लेता, वैसे ही हमारे कर्म भी निष्फल हो रहे हैं ॥13॥   |   mahabharat अध्याय 12.10: भीमसेनका राजाके लिये संन्यासका विरोध करते हुए अपने कर्तव्यके ही पालनपर जोर देना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 10: भीमसेनका राजाके लिये संन्यासका विरोध करते हुए अपने कर्तव्यके ही पालनपर जोर देना  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक  12.10.13 
यथान्नं क्षुधितो लब्ध्वा न भुञ्जीयाद् यदृच्छया।
कामीव कामिनीं लब्ध्वा कर्मेदं नस्तथोपमम्॥ १३॥
 
 
अनुवाद
जैसे भूखा मनुष्य भोजन का आनंद नहीं लेता और कामी पुरुष प्रारब्धवश स्त्री का आनंद नहीं लेता, वैसे ही हमारे कर्म भी निष्फल हो रहे हैं ॥13॥
 
Just as a hungry man does not enjoy food and a lustful man does not enjoy a woman due to destiny, our actions too are becoming fruitless. ॥13॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)