श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 1: युधिष्ठिरके पास नारद आदि महर्षियाेंका आगमन और युधिष्ठिरका कर्णके साथ अपना सम्बन्ध बताते हुए कर्णको शाप मिलनेका वृत्तान्त पूछना  »  श्लोक 42-43h
 
 
श्लोक  12.1.42-43h 
कुन्त्या हि सदृशौ पादौ कर्णस्येति मतिर्मम।
सादृश्यहेतुमन्विच्छन् पृथायास्तस्य चैव ह॥ ४२॥
कारणं नाधिगच्छामि कथंचिदपि चिन्तयन्।
 
 
अनुवाद
मेरा मानना ​​है कि कर्ण के दोनों पैर माता कुंती के पैरों से मिलते-जुलते थे। कुंती और कर्ण के पैरों में इतनी समानता क्यों है? मैं इसका कारण जानने के लिए बहुत सोचता था; पर किसी कारणवश मुझे कोई कारण समझ नहीं आता था। 42 1/2
 
I believe that both feet of Karna were similar to the feet of mother Kunti. Why is there such similarity between the feet of Kunti and Karna? I used to think a lot to find the reason for this; but somehow I could not understand any reason. 42 1/2.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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