श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 1: युधिष्ठिरके पास नारद आदि महर्षियाेंका आगमन और युधिष्ठिरका कर्णके साथ अपना सम्बन्ध बताते हुए कर्णको शाप मिलनेका वृत्तान्त पूछना  »  श्लोक 40-41
 
 
श्लोक  12.1.40-41 
यदा ह्यस्य गिरो रूक्षा: शृणोमि कटुकोदया:॥ ४०॥
सभायां गदतो द्यूते दुर्योधनहितैषिण:।
तदा नश्यति मे रोष: पादौ तस्य निरीक्ष्य ह॥ ४१॥
 
 
अनुवाद
जब कभी वे द्यूतशाला में दुर्योधन के हित के लिए बोलते और मैं उनके कटु एवं कठोर वचन सुनता, तो उनके चरणों को देखते ही मेरा बढ़ता हुआ क्रोध शांत हो जाता था ॥40-41॥
 
Whenever he would speak in the gambling hall for Duryodhan's welfare and I would listen to his bitter and harsh words, my rising anger would subside just by looking at his feet. ॥ 40-41॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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