श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 1: युधिष्ठिरके पास नारद आदि महर्षियाेंका आगमन और युधिष्ठिरका कर्णके साथ अपना सम्बन्ध बताते हुए कर्णको शाप मिलनेका वृत्तान्त पूछना  »  श्लोक 26-27
 
 
श्लोक  12.1.26-27 
गता किल पृथा तस्य सकाशमिति न: श्रुतम्॥ २६॥
अस्माकं शमकामा वै त्वं च पुत्रो ममेत्यथ।
पृथाया न कृत: कामस्तेन चापि महात्मना॥ २७॥
 
 
अनुवाद
ऐसा सुना जाता है कि मेरी माता कुन्ती हम दोनों के बीच संधि कराने की इच्छा से उसके पास गयीं और उससे कहा कि ‘तुम मेरे पुत्र हो।’ किन्तु महाहृदयी कर्ण ने माता कुन्ती की यह इच्छा पूरी नहीं की। 26-27.
 
It is heard that my mother Kunti went to him with the desire to make a peace between us and told him that 'You are my son'. But the great-hearted Karna did not fulfill this desire of mother Kunti. 26-27.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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