श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 1: युधिष्ठिरके पास नारद आदि महर्षियाेंका आगमन और युधिष्ठिरका कर्णके साथ अपना सम्बन्ध बताते हुए कर्णको शाप मिलनेका वृत्तान्त पूछना  »  श्लोक 24-25h
 
 
श्लोक  12.1.24-25h 
अजानता मया भ्रात्रा राज्यलुब्धेन घातित:॥ २४॥
तन्मे दहति गात्राणि तूलराशिमिवानल:।
 
 
अनुवाद
मैंने राज्य के लोभ से अनजाने में अपने भाई को उसके ही हाथों मरवा डाला। इस बात की चिन्ता मेरे शरीर को ऐसे जला रही है, जैसे आग रूई के ढेर को भस्म कर देती है।
 
I unknowingly got my brother killed by my brother's own hands due to greed for the kingdom. The worry of this matter is burning my body like fire reduces a heap of cotton to ashes.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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