श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 1: युधिष्ठिरके पास नारद आदि महर्षियाेंका आगमन और युधिष्ठिरका कर्णके साथ अपना सम्बन्ध बताते हुए कर्णको शाप मिलनेका वृत्तान्त पूछना  »  श्लोक 23-24h
 
 
श्लोक  12.1.23-24h 
मञ्जूषायां समाधाय गङ्गास्रोतस्यमज्जयत्।
यं सूतपुत्रं लोकोऽयं राधेयं चाभ्यमन्यत॥ २३॥
स ज्येष्ठपुत्र: कुन्त्या वै भ्रातास्माकं च मातृज:।
 
 
अनुवाद
नारद जी! कर्ण के जन्म के बाद मेरी माता कुंती ने उसे एक पिटारी में रखकर गंगा में प्रवाहित कर दिया था। जिसे अब तक सारा संसार अधिरथ और राधा का पुत्र मानता था, वह कुंती का ज्येष्ठ पुत्र और हमारा सगा भाई था। 23 1/2।
 
Narada ji! After the birth of Karna, my mother Kunti had placed him in a box and floated him in the Ganges. The one whom the whole world till now considered to be the son of Adhirath and Radha, was the eldest son of Kunti and our real brother. 23 1/2.
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas