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श्लोक 12.1.14  |
इदं मम महद् दु:खं वर्तते हृदि नित्यदा।
कृत्वा ज्ञातिक्षयमिमं महान्तं लोभकारितम्॥ १४॥ |
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| अनुवाद |
| परंतु मेरे हृदय में यह महान् दुःख सदैव बना रहता है कि मैंने लोभवश अपने स्वजनों का महान् संहार किया॥14॥ |
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| But this great sorrow always remains in my heart that out of greed I caused a great massacre of my relatives. 14॥ |
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