श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 1: युधिष्ठिरके पास नारद आदि महर्षियाेंका आगमन और युधिष्ठिरका कर्णके साथ अपना सम्बन्ध बताते हुए कर्णको शाप मिलनेका वृत्तान्त पूछना  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  12.1.14 
इदं मम महद् दु:खं वर्तते हृदि नित्यदा।
कृत्वा ज्ञातिक्षयमिमं महान्तं लोभकारितम्॥ १४॥
 
 
अनुवाद
परंतु मेरे हृदय में यह महान् दुःख सदैव बना रहता है कि मैंने लोभवश अपने स्वजनों का महान् संहार किया॥14॥
 
But this great sorrow always remains in my heart that out of greed I caused a great massacre of my relatives. 14॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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