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mahabharat 11.7.8: हे भरतनन्दन! इन महान हिंसक पशुओं द्वारा कर्मरूपी कर्मों के कारण निरन्तर सताए और रोके जाने पर भी मंदबुद्धि मनुष्य संसार से विचलित या विरक्त नहीं होते॥8॥   |   mahabharat अध्याय 11.7: संसारचक्रका वर्णन और रथके रूपकसे संयम और ज्ञान आदिको मुक्तिका उपाय बताना   ।   mahabharat पर्व 11: स्त्री पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 11: स्त्री पर्व  »  अध्याय 7: संसारचक्रका वर्णन और रथके रूपकसे संयम और ज्ञान आदिको मुक्तिका उपाय बताना  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक  11.7.8 
क्लिश्यमानाश्च तैर्नित्यं वार्यमाणाश्च भारत।
स्वकर्मभिर्महाव्यालैर्नोद्विजन्त्यल्पबुद्धय:॥ ८॥
 
 
अनुवाद
हे भरतनन्दन! इन महान हिंसक पशुओं द्वारा कर्मरूपी कर्मों के कारण निरन्तर सताए और रोके जाने पर भी मंदबुद्धि मनुष्य संसार से विचलित या विरक्त नहीं होते॥8॥
 
Bharatnandan! Despite being constantly harassed and restrained by these great violent animals in the form of their karma, the dull-witted humans do not get disturbed or detached from the world. 8॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)