श्री महाभारत  »  पर्व 11: स्त्री पर्व  »  अध्याय 7: संसारचक्रका वर्णन और रथके रूपकसे संयम और ज्ञान आदिको मुक्तिका उपाय बताना  »  श्लोक 28-29h
 
 
श्लोक  11.7.28-29h 
नानामोहसमायुक्ता बुद्धिजालेन संवृता:॥ २८॥
असूक्ष्मदृष्टयो मन्दा भ्राम्यन्ते तत्र तत्र ह।
 
 
अनुवाद
जो मूर्ख मनुष्य नाना प्रकार की आसक्तियों में लिप्त रहते हैं, जो बुद्धि के जाल में बंधे हुए हैं और जिनकी दृष्टि स्थूल है, वे नाना योनियों में भटकते हैं।
 
The foolish ones who are engrossed in various kinds of attachments, who are bound in the net of the intellect and whose vision is gross, they wander in different species. 28 1/2
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)