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mahabharat 11.7.26: रक्षा करने से मनुष्य को जो फल मिलता है, वह प्रतिदिन हजारों यज्ञ और व्रत करने से भी नहीं मिल सकता ॥26॥   |   mahabharat अध्याय 11.7: संसारचक्रका वर्णन और रथके रूपकसे संयम और ज्ञान आदिको मुक्तिका उपाय बताना   ।   mahabharat पर्व 11: स्त्री पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 11: स्त्री पर्व  »  अध्याय 7: संसारचक्रका वर्णन और रथके रूपकसे संयम और ज्ञान आदिको मुक्तिका उपाय बताना  »  श्लोक 26
 
 
श्लोक  11.7.26 
न तत् क्रतुसहस्रेण नोपवासैश्च नित्यश:।
अभयस्य च दानेन यत् फलं प्राप्नुयान्नर:॥ २६॥
 
 
अनुवाद
रक्षा करने से मनुष्य को जो फल मिलता है, वह प्रतिदिन हजारों यज्ञ और व्रत करने से भी नहीं मिल सकता ॥26॥
 
The reward which a man gets by giving protection cannot be obtained even by performing thousands of sacrifices and fasting every day. ॥26॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)