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mahabharat 11.4.12: हे प्रभु! यह सारा जगत लोभ से ठगा जा रहा है। लोभ, क्रोध और भय से इतना उन्मत्त हो गया है कि इसे अपने स्वरूप का भी ज्ञान नहीं है॥12॥   |   mahabharat अध्याय 11.4: दु:खमय संसारके गहन स्वरूपका वर्णन और उससे छूटनेका उपाय   ।   mahabharat पर्व 11: स्त्री पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 11: स्त्री पर्व  »  अध्याय 4: दु:खमय संसारके गहन स्वरूपका वर्णन और उससे छूटनेका उपाय  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  11.4.12 
अहो विनिकृतो लोको लोभेन च वशीकृत:।
लोभक्रोधभयोन्मत्तो नात्मानमवबुध्यते॥ १२॥
 
 
अनुवाद
हे प्रभु! यह सारा जगत लोभ से ठगा जा रहा है। लोभ, क्रोध और भय से इतना उन्मत्त हो गया है कि इसे अपने स्वरूप का भी ज्ञान नहीं है॥12॥
 
Oh! This whole world is being duped by greed. It has become so mad due to greed, anger and fear that it does not even know itself.॥12॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)