श्री महाभारत  »  पर्व 11: स्त्री पर्व  »  अध्याय 25: अन्यान्य वीरोंको मरा हुआ देखकर गान्धारीका शोकातुर होकर विलाप करना और क्रोधपूर्वक श्रीकृष्णको यदुवंशविनाशविषयक शाप देना  »  श्लोक 4-5
 
 
श्लोक  11.25.4-5 
हतबन्धुरनाथा च वेपन्ती मधुरस्वरा॥ ४॥
आतपे क्लाम्यमानानां विविधानामिव स्रजाम्।
क्लान्तानामपि नारीणां श्रीर्जहाति न वै तनू:॥ ५॥
 
 
अनुवाद
श्री कृष्ण! यह रानी अपने जीवन-सखा की मृत्यु से अनाथ होकर काँप रही है और मधुर स्वर में विलाप कर रही है। जैसे नाना प्रकार की पुष्पमालाएँ धूप में मुरझा जाती हैं, वैसे ही ये रानियाँ सूर्य से झुलस गई हैं, फिर भी इनके शरीर की शोभा नहीं जा रही है॥ 4-5॥
 
Sri Krishna! This queen, orphaned by the death of her life-friend, is trembling and wailing in a sweet voice. Like various kinds of flower garlands withering in the sun, these queens have been scorched by the sun, yet the beauty of their bodies is not leaving.॥ 4-5॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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