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श्लोक 11.2.36  |
शुभेन कर्मणा सौख्यं दु:खं पापेन कर्मणा।
कृतं भवति सर्वत्र नाकृतं विद्यते क्वचित्॥ ३६॥ |
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| अनुवाद |
| शुभ कर्म सुख लाते हैं और पाप कर्म दुःख। सर्वत्र अपने ही कर्मों का फल मिलता है, उन कर्मों का नहीं जो कहीं नहीं किये जाते ॥36॥ |
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| Good deeds bring happiness and sinful deeds bring sorrow. Everywhere one gets the fruits of one's own deeds and not of those which are not done anywhere. ॥ 36॥ |
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